Friday, 1 September 2017

मैं तो सिर्फ तुम्हारी होना चाहती हूं....!!!

मेरी-तुम्हारी सोच से कही परे था...
अमृता,साहिर और इमरोज़ को समझना...
इक ऐसी उलझन,
जिसे जैसे कोई सुलझाना ही ना चाहता हो..
बस इन तीनो की प्यार की,
गहराई की हदो के पार की,
परिभाषाएं समझना चाहते है...
जहां अमृता साहिर की होना चाहती है...
वही इमरोज़ अमृता के होना चाहते है....
कोई किसी को पाना नही चाहता,
सिर्फ उसी का हो जाना चाहता है....
अच्छा सुनो...
तुम क्या बनना चाहते हो,
अमृता,साहिर या इमरोज़..
तुम जो भी बनो...
मैं तो सिर्फ तुम्हारी होना चाहती हूं....!!!

कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ....!!!

कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ,
गर मैं तुम्हे ना मिलती तो कहां होती...
हाँ शायद खुले आसमान में,
उड़ रही होती....
कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ,
गर मैं तुम्हे ना लिखती तो क्या होती...
हाँ शायद किसी कवि के ख्यालो की,
मैं भी कोई कविता होती...
[कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ,
गर मैं तुम्हारी मंजिल ना होती,
तो क्या होती...
हाँ शायद किसी मुसाफ़िर का,
कोई भुला हुआ रास्ता होती...!!!

Thursday, 13 July 2017

जब मैं माँ बनूँगी,...!!!

जब मैं माँ बनूँगी,...
इक दुनिया का खूबसूरत एहसास,
जिसे शब्दो में बयां नही किया जा सकता है,
मैं चाहती हूँ तुम हर पल मेरे साथ रहना,
इस एहसास को मेरे साथ जीना,
तुम्हे ही हर पल देखना चाहती हूँ,
जिससे तुम्हारी ही छवि मुझमें आये,
अपनी उँगलियों से तुम्हारे होठो की,
मुस्कान की नाप ले लूँ,
कि जब तुम्हे देख कर वो मुस्कराये तो,
वो मुस्कान तुम्हे तुम्हारी लगे,
तुम्हारी आँखों में चाँद,तारे...
अपनी आँखों में भर लूँ,कि
जब तुम उसकी आँखों में,
देखो तो खुद को पाओगे,
तुम्हारी उँगलियों के निशाँ,
अपनी उँगलियों में ले लूँ,
कि तुम उसके उँगलियों को थामो,
वो एहसास तुम्हारा लगे...
मैं चाहती हूँ कि मैं नादानियाँ करूँ और,
तुम मुझ पर गुस्सा करो,
और मुस्करा कर मना भी लो,
मैं बताना चाहती हूँ उसको कि,
उसके पिता कितना प्यार करते है उसे...
मुझे पता तुम जताते नही हो,
पर उसकी हर सांस के साथ,
तुम्हारी सांसे चलती है...
मैं जानती हूँ उसके आने पहले ही,
तुमने लाखों सपने सजा लिए है,
उसके लिए तुमने इक,
नयी दुनिया बना ली है...
लोग कहते है कि इक माँ होने एहसास,
सिर्फ स्त्री ही महसूस करती है,
पर मैं कहती हूँ कि...
मुझे माँ कहने वाला तो,
नौ महीने बाद आये हो,
पर तुम मेरे लिए माँ पहले ही बन गए थे....!!!

Wednesday, 5 July 2017

निशान रह गए थे...!!!

उस रात मेरी हथेली पर,
तुम अपनी उँगलियों से जाने क्या ढूंढ रहे थे,
शायद कुछ लिख रहे थे...
शायद अपना नाम लिख कर मिटा दिया था,
या मेरा नाम लिख कर मिटा रहे थे..
तुम्हे लगा मैं सो गई हूँ,
पर सच कहूं...
मैं तो उस एहसास में गुम थी,
जब तुम मेरी हथेली पर,
उंगलिया अपनी गोल-गोल घुमा रहे थे....
मैं समझ तो नही पायी थी कि,
उस रात तुमने क्या लिखा था मेरी हथेली पर..
तुमने मिटा तो दिया था,
पर निशान रह गए थे,
तुम्हारी उँगलियों के मेरी हथेली पर...!!!

Saturday, 24 June 2017

जब सफर पर मैं रहती हूँ...!!!

तुम्हारे साथ जब मैं चलती हूँ,
राहे कहाँ याद रहती है मुझे,
गालिया भी मैं भूल जाती हूँ..
निगाहे तो सिर्फ अपनी,
मंजिल पर यानि,
तुम पर ठहरी रहती है..
किन राहो से पहुँची हूँ,
इसकी परवाह कहाँ करती हूँ....
तुम्हारे साथ जब सफर पर मैं रहती हूँ...

Friday, 23 June 2017

यूँ ही इक पल की कहानी.....!!!


उस दिन जब मैं तुमसे नाराज हो रही थी की तुमको इतने काल की तो जवाब क्यों नही दिया,कितनी इमरजेंसी थी पता है तुमको....और तुमने बहुत बेबाकी से मुझसे कहाँ पचास बार फोन करोगी,तो इमरजेंसी में भी नही उठेगा...मैं तो जैसी अवाक् सी रही गयी तुम्हारे इस जवाब से,सोच में पड़ गयी की मैं कौन हूँ तुम्हारे लिए...उस दिन जिंदगी का इक बहुत बड़ा सबक तुमने मुझे दिया था,कि फ़ोन कौन कर रहा है वो अहमियत नही रखता,कितनी बार किया गया बस ये जरुरी है....मैं कितनी पीछे थी तुम्हारी इस सोच से तुम कितने आगे थे मुझसे...तभी मुझे याद आया मेरी इक सहेली जो तभी किसी को काल करती है जब उसको जरुरत होती है,वो कुछ भी नही कर रही होती है फिर भी कहती है बहुत बिजी हूँ...वो कहती है कि किसी को अपना वक़्त दो तो ये जताओ की कितनी मुश्किल से तुमने उसके लिए वक़्क्त निकाला है...तब तो तुम्हारी कोई अहमियत होगी,नही तो सामने वाला तुम्हे बेवकूफ समझेगा...मैंने भी तो कभी तुम्हे ये नही जताया कि मैं तुम्हारे लिए वक़्त बड़ी मुश्किल से निकाला है,बल्कि मेरा तो सारा वक़्क्त ही तुम्हारे लिए था...मैं कभी तुम्हे मना कर ही नही पायी...या यूँ कहो की जिंदगी में मैंने तुम्हे सबसे पहले रखा,तुम्हारे लिए ही वक़्त,तुमसे ही हर बात...मैंने तो बारिश की बूंदों की बात हो,या चांदनी रात हो..सबके बारे में तुमसे ही बात की...पर मुझे नही पता था,प्यार में दिमाग से काम लेना होता..
#यूँहीइकपलकीकहानी#

Monday, 19 June 2017

मेरी और तुम्हारी...!!!

हर कोई पढ़ लेता है आँखे,
मेरी और तुम्हारी...
हम बताये या ना बताये,
लोग खुद ही कितने किस्से गढ़ लेते है...
मेरे और तुम्हारे....
हम मुस्करा भी दे,
गर इक-दूजे को देख कर,
कितने कहकहे बना लेते है..
मेरे और तुम्हारे...
मैं कुछ लिख भी दूँ,
तो मेरे शब्दों में अंदाज़ तुम्हारे पढ़ लेते है...
मैं लिखती तो सिर्फ कविता हूँ,
उनमे लोग कहानियां गढ़ लेते...
मेरी और तुम्हारी....